गजल
मै सवाल और तू है जवाब सा,
फेंका गया मैं मुरझाए गुलाब सा।
आंखो में बसा रहा ताउम्र मैं
हकीकत नहीं हुआ ख्वाब सा।
तुमने कहा मेरी आंखे नशीली है,
शायद इनमे कुछ हो शराब सा।
तुम कोई परी हो तो क्या हुआ,
मैं भी अपनी गली का नवाब सा।
नजरें यूं दिखा कर चुराओ मत,
तेरा रुवाब कहां मेरे रूवाब सा।
तमाम कोशिशें की कि पहचाने,
सिपाही चेहरे पर चेहरा नकाब सा।
~ सिपाही यादव
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें