गहरे सैलाब की रवानी में,
आज साहिल कहीं नहीं मिलती।
डूबते लोग बस समंदर में,
आज पतवार इक नहीं मिलती।।
हद से हम आज जो गुजर बैठे,
मंजिलें आसान इक नहीं मिलती।
जुर्रत ए दीवार बढ़ गई ऐसी,
उनकी आहट कोई नहीं मिलती।।
चाँदनी रात अब तो फीकी लगे,
इन बहारों से ना सकूं मिलती।
बात करते हैं चाँद तारों की,
उनको फुर्सत तो अब नहीं मिलती।।
जिन्दगी हो गई है इक पतझड़,
मौसम ए शाद इक नहीं मिलती।
अब तो है बस गुलों में रुसवाई,
इक फिजा आज है नहीं मिलती।
दायरे उनके जो गुजर बैठे,
रश्म ए इकरार अब नहीं मिलती।
हमने देखे हैं आज महलों में,
शख्सियत पाक इक नहीं मिलती।।
आईने झाँक ले दिल-ए-नादां,
अक्स गुलजार अब नहीं मिलती।
तुझको मालूम है नहीं शायद,
कद्र-ए-इश्क अब नहीं मिलती।।
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