विज्ञापन

गहरे सैलाब की रवानी..

Rajesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गहरे सैलाब की रवानी में,
        
                                                    
                            
आज साहिल कहीं नहीं मिलती।
डूबते लोग बस समंदर में,
आज पतवार इक नहीं मिलती।।

हद से हम आज जो गुजर बैठे,
मंजिलें आसान इक नहीं मिलती।
जुर्रत ए दीवार बढ़ गई ऐसी,
उनकी आहट कोई नहीं मिलती।।

चाँदनी रात अब तो फीकी लगे,
इन बहारों से ना सकूं मिलती।
बात करते हैं चाँद तारों की,
उनको फुर्सत तो अब नहीं मिलती।।

जिन्दगी हो गई है इक पतझड़,
मौसम ए शाद इक नहीं मिलती।
अब तो है बस गुलों में रुसवाई,
इक फिजा आज है नहीं मिलती।

दायरे उनके जो गुजर बैठे,
रश्म ए इकरार अब नहीं मिलती।
हमने देखे हैं आज महलों में,
शख्सियत पाक इक नहीं मिलती।।

आईने झाँक ले दिल-ए-नादां,
अक्स गुलजार अब नहीं मिलती।
तुझको मालूम है नहीं शायद,
कद्र-ए-इश्क अब नहीं मिलती।।


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all