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दफ्तर में

Rajesh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आधी जिंदगी गुजर गई दफ़्तर में
        
                                                    
                            
सुबह वो जाता शाम को आता
काम बड़ा था दफ्तर में

पत्नी जेबें टटोलती
बच्चे पतलून से लटकते
बोले इतना देर हुई कहाँ
मैंने बोला दफ्तर में

महीना होता तनख्वाह आती
जैसे सांस आती दफ़्तर में
घर उसका था, लोग सब अपने थे
छूट गया वक़्त दफ़्तर में

इक रोज ज़ब देखता है वो पन्ने पलटकर
हिसाब लगाता ज़ब दफ्तर में
मूल्य क्या रहा मेरे समय का
सोच रहा दिल दफ्तर में

रोटी के पीछे भागते-भागते
दिन निकल गए
क्या हुआ उन जो ख्वाहिशों का
तड़प कर मर गईं जो दफ़्तर में

सब कुछ बुरा भी नहीं था
कुछ नोट कमाए दफ़्तर में

बच्चे प्रेम को तरसे
मालिक बारिश - सा रोज बरसे
आती सुनामी दफ़्तर में

बैठे हैं खाना खाने मगर
शोर शराबा दफ़्तर में
खाने के बाद घर मिठाई हैं खाते
ये गाली खाते दफ्तर में

कुछ इच्छाओं और मजबूरियों में
ये सब सह जाते दफ्तर में
दफ्तर का काम ये घर ले आता
कुछ तारीफें बटोरता दफ्तर में

अंत में उसका जन्मदिन आया
आई रसमलाई,आए चमचे
सबने उड़ाई दावत दफ़्तर में
एक महीने पहले
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