चक्कू छुरियां तेज करा लो, बच्चे रोवें रोटी को....
देशभक्ति का गाना गा लो, बच्चे रोवें रोटी को....
स्कूल नहीं शिक्षा नहीं अस्पताल हैं कहीं कहीं
आपस में सिर फुड़वा लो बच्चे रोवें रोटी को
भूखे रहे फसल उगाई, बैंक से लोन कराई
दंगाइयों ने फसल जलाई बच्चे रोवें रोटी को
न हम जानें हिन्दू शास्त्र न हम जानें लव जेहाद
फसल के वाजिब दाम दिला दो बच्चे रोवें रोटी को
बूढ़ी माँ का सिर फोड़ा, बिटिया ने स्कूल छोड़ा,
अमन चैन कायम करा दो बच्चे रोवें रोटी को
अच्छे दिन का वादा करके जो आए सत्ता में उभर के
उनका वादा पूरा करा दो बच्चे रोवें रोटी को
तन पै हमारे कपड़ा नहीं, किसी से हमारा लफड़ा नहीं
हमें भी नौ लखा सूट दिला दो बच्चे रोवें रोटी को
- राजेश कुमार
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।