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नियम जंगल का

Rajeev kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब तक दोनों हाथों में एक-सी तलवारें हैं,
        
                                                    
                            
तब तक चलती अदालतें और सरकारें हैं।
जब तक तुम भी बराबर हो, मैं भी बराबर हूँ,
तब तक ज़िंदा मज़हब, नियम और दीवारें हैं।

निहत्थे हाथ मिलें तो तर्क राह दिखाता है,
मगर यह बात बस किताबों में सुहाता है।
हक़ीक़त में तो हर इंसान ढाल थामे है,
ताक़त के साये में ही ज्ञान पूजा जाता है।

जो लिखते हैं इतिहास, वही पन्ने बदलते हैं,
नियम कमज़ोर के पाँवों में बेड़ियाँ बनते हैं।
जीना है अगर जग में, खुद को भी गढ़ना होगा,
केवल बातों से कब दुनिया के इरादे ढलते हैं?

बराबर की जहाँ ताक़त, वहीं अमन पलता है,
जहाँ एक पक्ष भारी हो, अत्याचार चलता है।
जंगल का नियम तो 'ताक़त' ही रहा सदियों से,
'करुणा' से इस रीत का रुख़ कहां बदलता है?
2 महीने पहले
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