मैंने काटा—"व्यस्त हूँ अभी", मुझको थोड़ा-सा काम था।
मैं ही थोड़ा व्यस्त था बस, उसको करनी थोड़ी बात थी।
शाम हुई तो मित्र मिले, रात हुई कमरे में गया,
बैठकों और रील्स में ही, वक़्त यूँ ही बीत गया।
माँ का नंबर नीचे दबकर ,चुपचाप कहीं रह गया,
कहा था"बाद में माँ", "बाद" वैसा ही रह गया।
पूछेगी"खाना खाया क्या?", " काम से थक तो नहीं जाते हो?"
मौसम वहाँ खराब तो नहीं?", समय से घर तो आते हो ?
फिर वह अपनी बात बताए, छत पर गौरैया आई थी,
तेरे कमरे की खिड़की पर , आज धूप भर आई थी।
मैं सोचूँ इन छोटी बातों में, आखिर सुनने जैसा क्या?
माँ शायद यह सोच रही थी, बेटे से अब कहना क्या?
एक दिन मैंने फोन लगाया, माँ ने हँसकर याद दिलाया,
आज कैसे याद आ गई", मैं भी कुछ बोल न पाया।
था बचपन से जिस माँ के पास, बिन कहे जानती हर बात थी ।
मैं ही थोड़ा व्यस्त था बस, उसको करनी थोड़ी बात थी।
अब जब भी माँ फोन लगाती, मैं दुनिया को रोक देता हूँ,
दुनिया फिर वैसी हो जाएगी, माँ को पहले सुन लेता हूँ।
सच तो इतना ही है साहब, यहां किसकी कितनी औकात है?
हमको पूरी दुनिया चाहिए, माँ को करनी थोड़ी बात है।