नमन उस कलम के धनी को, जिसने युग का मान बढ़ाया,
शब्द-शब्द में सत्य जगाकर, मानवता का दीप जलाया।
वह केवल लेखक ही न थे, जन-जन की पहचान थे,
भारत की मिट्टी की खुशबू, हिंदी की वह शान थे।
अन्याय का अंधियारा था, जब पीड़ा का था राज,
प्रेमचंद की लेखनी ने छेड़ा, तब परिवर्तन का साज़।
झोपड़ियों की साँस लिखी, खेतों की हर आस लिखी,
रोते-बिलखते जीवन की, हर धड़कन, हर प्यास लिखी।
"गोदान" में होरी का जीवन, भारत का इतिहास बना,
मेहनतकश का कठिन संघर्ष, शोषित का विश्वास बना।
गबन" ने लोभ के चेहरे को, दुनिया के आगे खोल दिया,
"निर्मला" ने दहेज का दानव, शब्दों से ही तोल दिया।
"रंगभूमि" ने हमें सिखाया, अत्याचारों से लड़ना,
"कर्मभूमि" का मंत्र यही है, कर्म-पंथ पर है बढ़ना।
"ईदगाह" का नन्हा हामिद, सबका दिल जीत जाता है,
तजकर अपना सुख-बताशा, वह चिमटा ले आता है।
"दो बैलों की कथा" नहीं केवल पशुओं की कहानी है,
वह मित्रता, निष्ठा और प्रेम की अमर निशानी है।
"पूस की रात" की ठिठुरन आज भी कंपा जाती है,
कफ़न" की हर एक पंक्ति, सोई संवेदना जगाती है।
प्रेमचंद ने सिखलाया हमको, कलम कभी बिकती नहीं,
सच की राह कठिन हो चाहे, लेकिन कभी झुकती नहीं।
लेखनी जब जनहित में उठती, इतिहास नया लिख जाती है,
एक सच्ची आवाज़ सदियों तक दुनिया में गूँज जाती है।
आओ हम सब प्रण लें, उनके सपनों को साकार करेंगे,
हर बच्चे तक पुस्तक पहुँचे, ऐसा सुंदर संसार करेंगे।
जाति-धर्म के हर बंधन से ऊपर मानवता को मानेंगे,
सत्य, न्याय और प्रेमचंद के आदर्शों को पहचानेंगे।
गूँजे भारत, गूँजे हिंदी, गूँजे हर विद्यालय प्रांगण,
जब-जब साहित्य की बात चले, होगा उनका प्रथम स्मरण।
जब तक हिंदी जीवित होगी, जब तक जन-जन का सम्मान,
तब तक अमर रहेंगे हम सबके प्रिय मुंशी प्रेमचंद महान!