तरक्क़ी का जो छपता है, वो बस अख़बार लिखता है,
मगर बाज़ार में आटा, बहुत ही महँगा बिकता है।
तिजोरियाँ चंद लोगों की, हवा से तेज़ बढ़ती हैं,
मगर मज़दूर का चूल्हा, धुआँ देने से डरता है।
बड़े साहेब के दफ़्तर में, नया एक क़र्ज़ माफ़ हुआ,
यहाँ राशन की लाइनों में, बुढ़ापा रोज़ मरता है।
हुकूमत व्यस्त है अपनी, महज़ जलसों के जलवों में,
वहाँ संसद के भीतर अब, सिर्फ़ सन्नाटा पलता है।
दिखा कर ख़्वाब सोने का, जो पीतल बेच देते हैं,
उन्हीं की चालबाज़ी पर, यह पूरा तंत्र चलता है!