उम्मीदों का जनाज़ा
कई लोग मेरी हार देखने को तैयार बैठे हैं,
मेरे गिरने की दुआएँ लेकर बैठे हैं।
उन्हें क्या पता, मैं ठोकरों से भी
चलना सीख चुकी हूँ।
जिस दिन मेरी जीत का सूरज निकलेगा,
हम भी मुस्कुराएँगे,
और उनकी सारी उम्मीदों का
जनाज़ा निकाल देंगे।
— रजनी