शहर छोड़ने की बारी
जब शहर के सारे रास्ते
याद हो गए,
हर मोड़ अपना-सा लगने लगा,
हर गली में कोई किस्सा मिल गया—
तब समझ आया,
अब शहर छोड़ने की बारी आ गई।
जिन रास्तों पर
कभी अनजान होकर चले थे,
आज उन्हीं रास्तों से
बिछड़ना मुश्किल लग रहा है।
शहर से ज्यादा
उन यादों को छोड़ना कठिन है,
जो हर गली, हर मोड़
और हर रास्ते में बस गई हैं।
शायद जिंदगी भी ऐसी ही है—
जब सब कुछ समझ आने लगता है,
तभी किसी नए सफर के लिए
पुराना रास्ता छोड़ना पड़ता है।
जब शहर के सारे रास्ते याद हो गए,
तो शहर छोड़ने की बारी आ गई।
— रजनी