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शब्द गूँगे और बहरे हो गए

Rajani Shakyawar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शब्द गूँगे और बहरे हो गए
        
                                                    
                            

दर्द के जब रंग गहरे हो गए,
तब शब्द गूँगे और बहरे हो गए।

कहने को बहुत कुछ था दिल में,
मगर होंठ जैसे ठहरे हो गए,
आँखों ने सब कुछ कह दिया,
और शब्द खुद ही बेअसर हो गए।

जिसे पुकारा, उसने सुना नहीं,
जिसे समझाया, वह समझा नहीं,
धीरे-धीरे हम भी
अपनी ही खामोशी के पहरे हो गए।

अब दर्द बयान नहीं होता,
बस आँखों में उतर आता है,
कुछ ज़ख्म इतने गहरे होते हैं
कि उन्हें शब्दों में कहना भी
मुश्किल हो जाता है।

दर्द के जब रंग गहरे हो गए,
तब शब्द गूँगे और बहरे हो गए।
— रजनी
एक घंटा पहले
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