प्रेम चुनाव नहीं, विवशता है
प्रेम कोई चुनाव नहीं होता,
कि चाहा तो कर लिया,
न चाहा तो छोड़ दिया।
अगर प्रेम सच्चा है,
तो वह तुम्हारी विवशता होगा—
तुम चाहकर भी उससे
दूर नहीं जा पाओगे।
जिस प्रेम के सामने
तुम्हारे पास
हाँ या ना कहने का विकल्प हो,
वह प्रेम नहीं,
सिर्फ़ एक पसंद है।
सच्चा प्रेम तो वह है
जो निर्णय नहीं माँगता,
बस भीतर उतर जाता है,
और फिर इंसान
चाहकर भी उसे
अपने भीतर से निकाल नहीं पाता।
जिसे तुम हाँ कह सको
और ना भी कह सको,
वह प्रेम हो ही नहीं सकता—
क्योंकि सच्चा प्रेम
इंसान की मर्ज़ी नहीं,
उसकी आत्मा की आवाज़ होता है।
— रजनी