पाँच सूत्र मेरी समझ के — जिन्होंने मेरी आँखें खोल दीं
समय ने सिखाया—कौन अपना है, कौन पराया,
गरीबी ने बताया—किसका सच कितना गहरा है।
गंदी प्रथाओं ने दिखाया—समाज की जंजीरें कितनी पुरानी हैं,
नारी के दुःख ने बताया—उसकी खामोशी में कितनी कहानियाँ हैं।
और नारी पर पुरुष का संप्रभुत्व—
इसने तो बहुत कुछ समझा दिया,
क्यों नारी की आवाज़ दबा दी जाती है,
क्यों उसके फैसले भी कोई और सुना देता है।
समय, गरीबी, गंदी प्रथा,
नारी का दुःख और नारी पर पुरुष का संप्रभुत्व—
इन पाँचों ने मेरी आँखें खोल दी हैं,
अब दुनिया को देखने की मेरी नज़र बदल गई है।
अब मैं हर रिवाज़ को सच नहीं मानती,
हर रिश्ते को पवित्र नहीं मानती,
हर पुरुष को मालिक नहीं मानती,
और हर चुप रहने वाली नारी को कमजोर नहीं मानती।
इन पाँचों ने मुझे तोड़ा भी,
और मुझे बनाया भी—
अब जो देखती हूँ,
आँखों से नहीं…
समझ से देखती हूँ।
— रजनी