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नज़रों की अनकही बात

Rajani Shakyawar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नज़रों की अनकही बात
        
                                                    
                            

वो देखता है मुझे, मगर बेहया नहीं,
मैं देखने लगूँ उसे, तो वो देखता नहीं।

उसकी नज़रें मुझ पर ठहरती तो हैं,
मगर मिलते ही जैसे डर जाती हैं कहीं।

कोई राज़ है उसकी खामोशी में,
जिसे वो अपनी आँखों से कहता नहीं।

मैं उसकी आँखों में उतरना चाहूँ,
वो पल भर में अपना चेहरा मोड़ लेता है।

शायद कुछ चाहतें नाम नहीं मांगतीं,
कुछ रिश्ते बस नज़रों में पलते हैं।

वो मुझे देखता है, फिर अनजान बन जाता है,
और मैं समझकर भी कुछ कहती नहीं।

ये कैसी कहानी है दो ख़ामोश आँखों की,
जिसमें कोई अपना होकर भी अपना नहीं।

— रजनी
2 दिन पहले
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