बूँद और समंदर
पाया तो तुझे
बूँद भर भी नहीं,
फिर भी तुझे खोने का डर
समंदर-सा है।
तेरा होना भी
मेरे हिस्से में कहाँ था,
फिर तेरे न होने का डर
इतना गहरा क्यों है?
न कोई वादा था,
न कोई रिश्ता मुकम्मल,
फिर भी दिल ने तुझे
अपना मान लिया।
शायद प्रेम यही तो है—
जिसे पाने की खुशी से ज्यादा,
उसे खो देने का डर हो।
तू मिला भी नहीं,
फिर भी तुझे खोने का डर
मेरे भीतर
समंदर-सा है।
— रजनी