डायन अहंकार, तू क्या-क्या खा गई,
खा गई, ग्रंथ खा गई।
खाते-खाते भगवान तक को
बेमानी कर गई।
न पाप से डरी, न सत्य से डरी,
न मर्यादा की कोई लाज रही,
अपनी ही कोख का मांस—
अपनी ही संतान खा गई।
अरे डायन! तू कितनी निर्लज्ज है,
तुझे लाज-शर्म क्यों नहीं आती?
तू तो समाज के सारे संस्कार
निगल गई, फिर मुँह क्यों छुपाती?
लोगों से भी, अपनों से भी,
अपने ही चेहरे से डरती है,
जिस अहंकार को ओढ़कर घूमती है,
उसी के साये से काँपती है।
अरे डायन अहंकार,
तूने सब कुछ अपना समझ लिया,
गुरु, ग्रंथ और भगवान तक
अपने भीतर दफ़्न कर लिया।
पर याद रख—
अहंकार चाहे कितना भी बड़ा हो,
सच के सामने टिक नहीं पाता,
जो दूसरों को निगलने निकलता है,
एक दिन खुद को ही खा जाता है।
— रजनी