आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अरे डायन अहंकार

                
                                                         
                            डायन अहंकार, तू क्या-क्या खा गई,
                                                                 
                            
खा गई, ग्रंथ खा गई।
खाते-खाते भगवान तक को
बेमानी कर गई।

न पाप से डरी, न सत्य से डरी,
न मर्यादा की कोई लाज रही,
अपनी ही कोख का मांस—
अपनी ही संतान खा गई।

अरे डायन! तू कितनी निर्लज्ज है,
तुझे लाज-शर्म क्यों नहीं आती?
तू तो समाज के सारे संस्कार
निगल गई, फिर मुँह क्यों छुपाती?

लोगों से भी, अपनों से भी,
अपने ही चेहरे से डरती है,
जिस अहंकार को ओढ़कर घूमती है,
उसी के साये से काँपती है।

अरे डायन अहंकार,
तूने सब कुछ अपना समझ लिया,
गुरु, ग्रंथ और भगवान तक
अपने भीतर दफ़्न कर लिया।

पर याद रख—
अहंकार चाहे कितना भी बड़ा हो,
सच के सामने टिक नहीं पाता,
जो दूसरों को निगलने निकलता है,
एक दिन खुद को ही खा जाता है।
— रजनी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
20 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर