इकरार नहीं इनकार सही
न देख ज़रा फ़िर मुड़ के तू
दरिया न सही सागर न सही
रह गुज़र गया मंजिल भी तू।
नींदों में सही ख्वाबों की कसम
लब पे है ज़फाओं का नज़राना
कातिल ही सही हम को कभी
नजरें ये इनायत कर जाना।
जीवन न सही हो फ़ना पे अग़र
लाली नजरें लिए वो आए
लब पर आएगी यही दुआ
कुछ ना आये बस मौत आये।
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