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क्योंकि शहर चाहे जितना बड़ा हो

Raj Rawat

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब शहर सो जाता है
        
                                                    
                            

जब शहर सो जाता है,
तब कुछ सपने जागते हैं,
बंद खिड़कियों के पीछे
कुछ लोग खुद से भागते हैं।

दिनभर चेहरे हँसते हैं,
रात सवाल कर जाती है,
जिसे दुनिया मजबूत समझती है,
वही भीतर से डर जाती है।

किसी के घर में रोटी कम है,
किसी के घर में बातें कम,
किसी के पास महँगे कपड़े,
फिर भी आँखों में नींद है कम।

हमने ऊँची इमारतें बनाईं,
पर रिश्ते छोटे कर डाले,
मोबाइल में दुनिया रख ली,
अपनों से नज़रें हटा डाले।

बूढ़े माँ-बाप दरवाज़े तक
आज भी राह निहारते हैं,
बच्चे कहते—“समय नहीं है”,
और समय को फोन में गुज़ारते हैं।

किसी गरीब का बच्चा पूछे—
“क्या मेरा सपना छोटा है?”
तो जवाब देने से पहले
अपना ज़मीर टटोलना।

क्योंकि सपनों की कीमत
जेब देखकर तय नहीं होती,
और इंसान की ऊँचाई
कपड़ों से तय नहीं होती।

कल जब आईना पूछेगा—
“तुमने क्या छोड़ा दुनिया में?”
तब धन-दौलत काम न आएगी,
बस याद रहोगे लोगों की दुआ में।

इसलिए थोड़ा रुक जाना,
किसी का हाथ थाम लेना,
जिसे दुनिया ने अकेला छोड़ा,
उसके पास जाकर बैठ जाना।

क्योंकि शहर चाहे जितना बड़ा हो,
इंसानियत उससे बड़ी होनी चाहिए,
और जिंदगी चाहे जितनी छोटी हो,
किसी के काम आनी चाहिए
एक महीने पहले
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