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कौन हो तुम?

Raj Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कौन हो तुम?
        
                                                    
                            
बताओ,
बताओ न;
तुम्हारा कोई नाम नहीं
कि मैं तुम्हें आवाज़ दे सकूँ?
तुम्हें कोई सूरत नहीं
कि मैं तुम्हें देख सकूँ?
कोई आँखें भी नहीं
कि मैं ख़ुद को तुम में झाँक सकूँ?
तुम्हारा कोई शरीर नहीं
कि मैं तुम्हें छू सकूँ?
ये क्या?
छाया भी नहीं
कि जिसके तले मैं बैठ सकूँ?
क्या हो?
मैं खुद की बात करूँ तो हूँ तो मैं एक इंसान।
मेरा नाम है
इसलिए नाम सोच पाता हूँ।
मुझको शक्ल है
इसलिए मैं एक शक़्ल की
कल्पना कर पाता हूँ।
मुझको आँखें हैं
तो मैं आँखें खोजता हूँ।
मुझको जिस्म है
इसलिए मुझमें छूने की चाह है।
आख़िर... हूँ तो
एक इंसान ही न
इसलिए...
क्या तुम कल्पना से परे हो,
असीम हो,
बंधन मुक्त हो?
क्या मैं तुम्हें नहीं जान सकता?
अगर नहीं, तो तुम मेरे अनुभवों
में क्यों उतरते हो?
मुझे महसूस क्यों होते हो?
आवाख्य हो,
या'नी, तुम्हें कहा नहीं जा सकता।
कुछ तो कहुँगा,
या'नी "तुम प्रेम हो"
लो, अब तुम में ख़ामोशी भी है।
2 महीने पहले
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