लिखना
सही नहीं है
चुप रहने की
ज़रूरत अभी है
ये जादू पाया...?
पर, कौन मान रहा है
कितनी जुस्तजूओं से...
लांछन लग गया है
ये,
बेकारी का...
ये,
बुज़दिली का...
भगवान, बस,
मार पीट ना होए :(
चिल्लाने वाले कीट...
मंडराके... जाने का भी सोचें?
मुझे नहीं कविता लिखनी है
मुझे दो रोटी कमानी है!
आपकी मेहरबानी से...
आंखों में आया पानी है
फिर दोहराईं गलतियों की...
सदा... हर तरफ़ गूंजती है
ऐसे में,
महबूब का
क्या ज़िक्र करें...
लो,
फूल, नूर...
उनकी राह में नज़्र करें...
ये अंधेरा...
इस कदर मुझे लपेटे 🙃
आज,
अपने उस इंसान से... कटें!!!
एक पत्थर की...
दीवाल... हरदम रहे!
भगवान
ज़रूरत के मुताबिक...
आप बरसा देना...
बे-रुख़ी के... एक दो कतरे
बिलकुल ही
विमुखी... नहीं बनेंगे!
-राहुल
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