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Rahul Shrivastava

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बची चीज़ें भी...
        
                                                    
                            
हो जातीं

पूरी तरह तह...
खुल जाती

देह की चोट
तो बहाना है...

मन का कचरा
नहीं निकालना है!

अनजानों में...
क्या कर रहा हूं?

पहचान-वालों से तो,
रूठ रूठ जाता हूं :(

भगवान थोड़ी
सहायता कर दो

मेरे शुरू किए काम
बनवा जाओ!

मेहबूब की दीद...
तलब की भीख...

मुझे, इन मंज़रों से... दूर कर दो 

मेरा, ये फालतू का फितूर... फू कर दो 

ख़ुशी में भी,
ऐसे ही लिखता रहूं...

फूलों, खुशबुओं के दिनों में...
पाठकों से ना दगा करूं!
-राहुल
20 घंटे पहले
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