थोड़ा थोड़ा चल...
आगे बढ़ूं
नैनों को मंज़िल...
से बांधे रखूं
ये कविता भी
भटकावा है!
सुस्ती को राहुल
झटकारना है!
थोड़ा सा गम... भी कोई गम होता है?
सुन लो रब... जो कहा नहीं जाता है 🥹
दुआएं सबको
मेरी तरफ से...
गिर जाएं बूंदें
रहम करने... नभ से...
अहम मिटाने...
दो एक...
सब्र की,
कमी ना रहे...
यादों की,
ध्वनि मद्धम होए...
अब, बस,
मर मिट जाऊं!
जो भी, मुझे, मकाम मिले...
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