गीत: अपना घर कौन सा?
दो-दो देहरी लाँघ चुकी पर, अपना घर न अब तक पाया।
पीहर ने परदेशी माना, ससुराल पराई ठहराया॥
हरी-भरी उस फुलवारी से,
निष्ठुर नाता तोड़ दिया।
ले जाकर अनजानी भू पर,
नन्हें पौध को रोप दिया॥
जड़ें न उसकी जम पाईं जब, पत्ता-पत्ता मुरझाया।
पीहर ने परदेशी माना, ससुराल पराई ठहराया॥
जिस आँगन की रही लाड़ली,
वो भी अब अनजाना है।
मात-पिता का स्नेह-समंदर,
लगता आज वीराना है॥
माली नया मिला था लेकिन, नीर नेह का दे न पाया
पीहर ने परदेशी माना, ससुराल पराई ठहराया॥
तिनका-तिनका चुनकर मैंने,
इक सुंदर-सा महल बनाया।
खून-पसीने से सिंचित कर,
कोना-कोना सदा सजाया॥
सबके मन को साध लिया पर, हक़ न मेरा मिल पाया।
पीहर ने परदेशी माना, ससुराल पराई ठहराया॥
सबका दामन खुशियों से भर,
रीत जगत की मैंने ढोई।
बेटी और बहू के भीतर,
सुध-बुध अपनी मैंने खोई।
किस चौखट पर दीप जलाऊँ, सबने दामन छुड़वाया।
पीहर ने परदेशी माना, ससुराल पराई ठहराया॥
बनकर परछाईं चौखट की,
निज अस्तित्व मिटा डाला।
औरों के सपने जीने में,
अपना हर स्वप्न लुटा डाला॥
भीड़ लगी अपनों की लेकिन, कोई पास नहीं आया।
पीहर ने परदेशी माना, ससुराल पराई ठहराया॥
-आचार्य प्रताप