हे त्रिनेत्र! हे महाकाल! हे भस्म-रमे वैरागी!
दुनिया की मुझको फिक्र नहीं, मैं तेरा ही अनुरागी।
छल-छद्म भरे इस जग में, बस निश्छल मन मेरा बचा रहे,
हे उमानाथ! हे डमरूधर! मेरा भोलापन बचा रहे!
है दुनिया क्या? बस मोह-जाल, मेरी तेरी में उलझी है।
मेरे प्राणों का हर स्पंदन, हे शिव! केवल तेरे चरणों में है।
क्या साधु-संत, क्या पापी-जन, सब आते तेरे द्वारे पर,
नत-मस्तक हो वरदान मांगते, तेरे ही जयकारे पर!
ठीक उसी विधि, इस दुनिया में, मेरे भी द्वार पर आते रहें,
कुछ टूटे से, कुछ हारे से, लोगों की उम्मीद जगाता रहूँ
मैं तो ठहरा मिट्टी का कण, मुझमें क्या सामर्थ्य धरा?
यह तो तेरी ही करुणा है, जिससे मेरा यह घट है भरा!
मैं शून्य अकिंचन, मूढ़-मति, विद्या का मुझको ज्ञान नहीं,
तेरे चरणों की रज के सिवा, मेरा कोई अभिमान नहीं।
पर जो भी यह जिज्ञासा है, जो ज्ञान-पिपासा जागी है,
हे नीलकंठ! तेरे आने से, मेरे अंतर में लागी है!
हे रुद्र! रहे यह आस जगी, यह सत्य कभी न विमुख रहे,
मैं भले रहूँ जग से अनजान, पर तुझसे मेरा मन लगा रहे!