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मुझको पूरा हो जाने दो

Rahul Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बुआ देहरी पर खांस रहीं थी
        
                                                    
                            
टूटती साँसों को थाम रही थी
अब बस हो जाने दो
मुझको पूरा हो जाने दो.....
अब शेष बचा ना शून्य बचा
ना राग बचा ना मोह बचा
अब बस हो जाने दो
मुझको पूरा हो जाने दो.......
अब व्यथित व्यथाएँ नहीं तोड़ती
अब पीड़ा कोई नहीं चुभती
अब तो बस स्वच्छन्द गति
मे मुझको बह जाने दो
मुझको पूरा हो जाने.......
ज़ब तक मै देहरी के अंदर
खुद से बातें कर लेती थी
आंगन मे बिखरे दानों को
खुद से चुन- चुन लेती थी
अब तो ये भी लगे पराये
कैसे-कैसे सिमटेंगे
बांहों का दामन छोटा पड़ता
अब तो बस सिकुड़ने दो
मुझको पूरा हो.........
छोटी थी तब इठलाती थी
घर आंगन मे कुदा करती थी
दिन दुपहरि हर पल मेरा
रात अंधेरा हर क्षण मेरा
जाने कब मै बड़ी हुई
जाने क्यों मै बड़ी हुई
बचपन की देहरी लाँघ गयी
यौवन की देहरी पार गयी
फिर छुटी देहरी बाबा का
पीहर से बंधन टुटा
अब टूट रहा है सभी सम्पर्पण
मुझको अब बस जाने दो
मुझको पूरा हो.......
मै टूटी कब, कब जुडी रही?
रिश्तों मे बस जमी रही
कब कौन पराया था
कब कौन मेरा अपना सा था
किससे दुख मै कुछ कह लेती
सुख के पल किसके साथ बीते
छोड़ दिया सबकुछ मैंने
बस मौन मे मुझको जीने दो
अब बस रहने दो
मुझको पूरा हो.........
तुम जियो जहाँ भी होगे तुम
अब लेना देना शेष नहीं
अब लाल समक्ष दो खड़े हुए
इतनी गरिमा ही आन चढ़ी
अब शेष बचा ना शून्य बचा
अब तो समर्पण करने दो
अब मोह तजो
अब मुक्त करो
अब बस विदा हो जाने दो
अंतिम बार ही सही
पर मुझको पूरा हो जाने दो...
मुझको पूरा हो....................?
2 महीने पहले
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