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नारी: शिक्षा और संस्कार

RAGHVENDRA SINGH

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                            नारी: शिक्षा और संस्कार
        
                                                    
                            
एक मौलिक कविता — नारी के सम्मान, आत्मनिर्भरता और भारतीय संस्कारों को समर्पित।

नारी केवल रूप नहीं, वह ज्ञान की पहचान है,
उसके उज्ज्वल व्यक्तित्व से रोशन हिंदुस्तान है।
शिक्षा उसके पंख हैं, संस्कार उसकी उड़ान,
उसके दृढ़ संकल्प से ही बनता नया जहान।
वह कलम उठाए हाथों में, तो इतिहास बदल सकती है,
अपने ज्ञान की शक्ति से, हर मुश्किल हल कर सकती है।
वह चाहे तो नभ छू ले, सागर पार भी जाए,
अपने श्रम और साहस से, जग में नाम कमाए।
शिक्षा उसको राह दिखाए, सत्य-असत्य का भेद बताए,
संस्कार उसे यह सिखलाएँ, मानवता का दीप जलाए।
शिक्षा दे उसको अधिकार, संस्कार दें व्यवहार,
दोनों मिलकर गढ़ते हैं, नारी का सुंदर संसार।
नारी को कमजोर न समझो, वह शक्ति की परिभाषा है,
उसकी ममता में गहराई, उसकी बुद्धि में आशा है।
वह बेटी बनकर घर महकाए, बहन बने तो प्यार लुटाए,
माँ बनकर जीवन सँवारे, कर्म से जग को राह दिखाए।
पर नारी की पहचान नहीं, केवल रिश्तों में सीमित हो,
उसका अपना स्वप्न भी हो, जीवन उसका विकसित हो।
वह अपने पैरों पर चलकर, अपना भाग्य बनाए,
ज्ञान, विवेक और आत्मसम्मान से, नई दिशा दिखलाए।
संस्कार नहीं बेड़ियाँ हों, जो उसके पथ को रोकें,
शिक्षा ऐसी ज्योति बने, जो बंद पड़े द्वार खोले।
परंपरा का मान रहे, पर सोच नई अपनाए,
अपने अधिकारों के संग, अपने कर्तव्य निभाए।
जिस घर में नारी शिक्षित हो, वहाँ विचार सँवरते हैं,
जिस घर में हों श्रेष्ठ संस्कार, वहाँ संबंध निखरते हैं।
जब नारी को मान मिलेगा, देश प्रगति कर जाएगा,
शिक्षा और संस्कारों से, भारत विश्व चमकाएगा।
आओ, मिलकर शपथ उठाएँ, यह संदेश जन-जन तक पहुँचाएँ,
नारी को शिक्षा, सम्मान दें, उसके सपनों को पंख लगाएँ।
संस्कारों से सजे उसका मन, शिक्षा से ऊँची हो उड़ान,
सशक्त नारी, समृद्ध समाज — यही हो भारत की पहचान!
-राघवेन्द्र सिंह
 
एक घंटा पहले
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