वाम राह,विध्वंस चाह,वह घर में फैला मकड़ जाल है।
रूस चीन से आयातित जो,उस खटमल का रंग लाल है।
चीखों में जो राग ढूंढता,शान्ति उसी को चुभती है।
देश विरोधी आग ढूँढता,क्रान्ति बमों की लुभती है।
जहर उगलते नाग ढूँढता,फन उनके सहलाता है।
बन्दूक में क्रान्तिक आग ढूँढता,नाम साम्य बतलाता है।
हाय ये कैसी है विडम्बना,गिरगिट भी अक्सर शर्माते।
दानव बेशर्मी से करते,मानव अधिकारों की बातें।
उन्नति का यह परम शत्रु है,अवनति इसकी पोषक है।
भारत के चलते पहिये का,यही बड़ा अवरोधक है।
हिन्द का बड़ा हितैषी दिखता,समझो इसकी कुटिल चाल है।
क्षुधा इसे बस लहू,सलाम की,दोनो का ही रंग लाल है।
वाम राह,विध्वंस चाह,वह घर में फैला मकड़ जाल है।
रूस-चीन से आयातित जो,उस खटमल का रंग लाल है।
इतिहासों के स्वर्ण पृष्ठ को,छूकर तुमने दाग लगाए।
उपहासों से कर्ण सताये,फिर जहरीले नाग बनाये।
शस्य-श्यामला बंग धरा को,तुमने मरु समान बनाया,
प्राची के अनुपम सौंदर्य को,भंग किया श्मशान बनाया।
जगद्गुरु की जन्मभूमि को,किया अपावन छल कपटों से।
मन्दिर तुमने भ्रष्ट कर दिए,साथी अदालती रपटों से।
चन्द्रगुप्त की कर्मभूमि में,बारूदों की गंध भरी है।
अमरनाथ की पुण्य भूमि में,हाय जेहादी आग लगी है।
तुम साँपों को पाल रहा है,वाह देश मेरा कमाल है।
आँख मूँदकर टाल रहा है,इसी बात का तो मलाल है।
वाम राह विध्वंस चाह,वह घर में फैला मकड़जाल है।
रूस चीन से आयातित जो,उस खटमल का रँग लाल है।
हे भारत के वीर पुत्र,अब लाल लहू तुम भी खौलाओ।
राणा सा क्षत्रियत्व जगाओ,लाल नेत्र तुम भी दिखलाओ।
तुम अर्जुन के वंसज हो, फिर कुरुक्षेत्र से क्यों घबराओ।
चक्रव्यूह सब खण्डित कर दो,कलम संग तलवार चलाओ।
राष्ट्र विरोधी पौधा विष का,हिन्दू भूमि पर उग ना पाए।
नई पौध उपजे सृजन की,और रोपणी रुक ना पाए।
शब्द,कोष दोनो को अतुलित,अर्थ,अर्थ से पूर्ण भरो।
सिन्धु पार भी हिन्द भूमि हो,
दृढ़ यह संकल्प करो।
जयचन्दों से नहीं मिटेगा
हिन्द,हिन्दू यह शब्द विशाल है।
मत छेड़ो जल जाओगे,यह अग्निकुण्ड बृहद विशाल है।
राघव पन्त
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