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वर्तमान सामाजिक परिवेश और मर्यादा का महत्व

Radheshyam Khatik

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बदला है नज़रिया इस ज़माने का,
        
                                                    
                            
कमतर समझते श्रमजल को यहाँ
तड़का लगा के झूठ और फ़रेब का,
सपना है सबका शोहरत को पाना। 

मजबूरों के वो लूट रहे अरमान
दफ़्न कर दिया सदाचार को यहाँ
रिश्तों में न बचा प्रेम और विश्वास
खुद छुप रही लाज और शर्म यहाँ।  

चल रहा है ज़ेहन में फ़ितूर उसके,
मिला नहीं कुछ जिसको भी यहाँ।
कोस रहा 'रब' को हर पल मन में,
बातें करता बड़ी-बड़ी नीति की जहाँ

मर्यादा तू अगर ख़ुद में बसा ले,
घर तेरा फिर तो स्वर्ग बन जाएगा।
संस्कृति का दामन जो थाम ले तू,
संसार में वैकुंठ भारत कहलाएगा!

 
3 घंटे पहले
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Shivam Awasthi

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