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तुमको मैंने जब जाना

Radha Chauhan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तुमको मैंने जब जाना, जीवन का मर्म है क्या,
        
                                                    
                            
तब पहचाना,
मैं राही हूँ किनारे का, तुम मझधार हो,
मुझ निराधार की तुम आधार हो।

जो चाहा मैंने, भाग्य ने सब छीना,
मैं मेघों को पुकारता मयूर, तुम सावन का महीना,
तुम मेरे जीवन का मूल, तुमको सौंप दिया हर क्षण,
तुमसे डोर श्वासों की, तुमसे हृदय का स्पंदन।

मैं वेदना से व्यथित हृदय, तुम राग मल्हार का,
तुम पर न्योछावर, यह वैभव समस्त संसार का,
मेरे इस जीवन पतझड़ में, तुम बसंत बनकर आई,
वह अम्बर है ज्यों धरती पर, त्यों मुझ पर तुम छाई।

मैं पिंजरबद्ध पंछी, तुमने उन्मुक्त गगन दिखाया,
मेरी डूब रही पतवार, तुमने लहरों पर तरना सिखाया ,
अवर्ण्य है तुमसे नाता, विदना ने जोड़ी हाथों की रेखा,
तुम्हारे इस रूप अनुपम में, मैंने सदा वह परमेश्वर देखा।

मुझ पर असंख्य बंधनों का पाश, प्रतिक्षण मुक्ति की आश,
पर इस एक बंधन ने तुम्हारे, खोल दिए द्वार सारे,
मुझको तो हर द्वार से, तुम तक है चलके आना,
तुमको मैंने जब जाना, तुमको मैंने जब जाना।
- राधा चौहान
एक महीने पहले
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