वैसे तो लोग कहते हैं
समय पर पत्थर भी पिघलेगा
मिलने को तो बहुत मिलेंगे
पर मुझको कोई तुझसा कहाँ मिलेगा
मेरी महबूबा हर पल अपने दिल का दरवाजा खोल कर रखती है,हो पतझड़ या बहार
कौन करेगा मेरे लिए इतना इंतजार
मैं अगर उससे कहीं दूर रहूं, महफिल या मैखाने में
मुझको हमेशा कैद रखती है अपने दिल के कैदखाने में
मेरी महबूबा नादान है, थोड़ी करती है नादानी
वह मुझको कहीं का राजकुमार समझती है
खुद को समझती है रानी
मेरे खुदा तूने उसे कैसी दी है बेखुदी
वह मेरे लिए इस दुनिया से लड़ जाएगी
हर हाल में उसको प्यारी है मेरी खुशी
उससे दूर रहकर मैं जब भी घर आता हूं
उसको जी भर एक नजर देख लेता हूं
तब मैं चैन पाता हूं
यह राज की बात है, किसी को क्या बताएंगे
हम मर कर भले इस दुनिया से चले जाएं
उसके दिल से कभी ना जायेंगे
-रविन्द्र अमन