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क्या खूब मिले हम यार

Rabindra Aman

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आग दोनो तरफ बराबर लगी थी ,
        
                                                    
                            
दोनो तरफ रहता था इंतजार
वो भी एक जमाना था ,
क्या खूब मिले हम यार

इस दुनिया से एक अलग अपनी दुनिया थी ,
एक अलग था जहान
एक दूजे पर हम खूब लूटा ते थे अपनी जान
हम लड़ते भी थे, हम में होती थी तकरार
वो भी एक जमाना था,
क्या खूब मिले हम यार

एक दूजे से इस कदर पड़ता था वादा निभाना
मैं कोलकाता के मिलेनियम पार्क में तुम्हारा इंतजार
करूंगा, तुम शाम को होकर तैयार
ठीक साढ़े सात बजे वहां आ जाना
खूब फला - फूला था अपने प्यार का कारोबार
वो भी एक जमाना था,
क्या खूब मिले हम यार

चाहे इस दुनिया की जितनी बड़ी दीवार हो
चाहे जितनी बड़ी हो मुश्किल
अगर मिलना चाहे तो हर हाल में मिल जाते है दो दिल
नही चलता है इस प्यार पर किसी का पहरा
यह प्यार कोई जादू है,
यह प्यार है चमत्कार
वो भी एक जमाना था
क्या खूब मिले हम यार

अब तो सिर्फ यादें है,
यह यादें ही अब आती है
यह याद जब आती है, थोड़ा हम को हँसाती है
थोड़ा हम को रुलाती है
आकर तुम मेरी यादों में
हमको रुलाओ हर बार
वो भी एक जमाना था
क्या खूब मिले हम यार
-रविन्द्र अमन
 
एक महीने पहले
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