विज्ञापन

तू बनारस की सुबह बन जाए मैं अवध की शाम बन जाऊँ

Rabeesh Anand

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तू बनारस की सुबह बन जाए
        
                                                    
                            
मैं अवध की शाम बन जाऊँ
तेरी रौशनी में भींगकर,
मैं अंधेरे को भी भूल जाऊँ

तू लखनऊ का ameenabaad बन जाए
मैं बनारस का कोई घाट बन जाऊँ
तू नजाकत में मुस्कुराए,
मैं तेरे कदमों में बह जाऊँ

तू गंगा सी शांत बहें
मैं तुझसे मिल के prayagraj बन जाऊँ
तीन धाराओं के संगम में ,
मै अपना नाम तक खो जाऊँ

तू शहरो सा सजा रहे
मैं तेरे नक्शे में गुम हो जाऊँ
तू इश्क की परिभाषा बने,
और मैं तुझमें अर्थ बन जाऊँ
7 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Aditya Mishra

1 कविता

View Profile

Anil Pandey

436 कविताएं

View Profile