तू बनारस की सुबह बन जाए
मैं अवध की शाम बन जाऊँ
तेरी रौशनी में भींगकर,
मैं अंधेरे को भी भूल जाऊँ
तू लखनऊ का ameenabaad बन जाए
मैं बनारस का कोई घाट बन जाऊँ
तू नजाकत में मुस्कुराए,
मैं तेरे कदमों में बह जाऊँ
तू गंगा सी शांत बहें
मैं तुझसे मिल के prayagraj बन जाऊँ
तीन धाराओं के संगम में ,
मै अपना नाम तक खो जाऊँ
तू शहरो सा सजा रहे
मैं तेरे नक्शे में गुम हो जाऊँ
तू इश्क की परिभाषा बने,
और मैं तुझमें अर्थ बन जाऊँ