अन्य कोई इन्सान नहीं है
कहा रहा हूं सुनो ध्यान से।
तुम्हारे कोई कान नहीं है।।
और बोल रहा हूं मैं तब भी।
जब मेरे मुंह में जबान नहीं है।।
चल रहे हैं हम सब पल पल।
पर चलने को स्थान नहीं है।।
हो रहे हैं यज्ञ अनंत ।
दिखता कोई यजमान नहीं है।।
सृष्टि का क्रम चल रहा है।
कब से कोई भान नहीं है।।
यह विपरीत दृश्य भासता।
तत्व का संज्ञान नहीं है ।।
मैं तुझ में हूँ, तू मुझ में में है।
अन्य कोई इन्सान नहीं है।।
एक सच्चिदानन्द की सत्ता।
पुरु अन्य कोई विद्यमान नहीं है।।
- पुरुषोत्तम श्रीवास्तव 'पुरु'