भीतर अग्नि धधक रही, मुख पर है मुस्कान।
असली नकली की यहाँ, मुश्किल है पहचान।।
इक अकेला चना नहीं, फोड़ सके है भाड़।
देख संघ ये भाँड के, करते देश कबाड़।।
---पुरुषोत्तम श्रीवास्तव 'पुरु'