सच कहूँ तो उड़ना
मुझे परिंदे की तरह है।
सच कहूँ तो बहना
मुझे कश्ती की तरह है।
सच कहूँ तो मुझे अपना
ठिकाना ढूँढना है।
सच कहूँ मुझे अपना
किनारा ढूँढना है।
सच कहूँ तो जुगनू की तरह
चमकना नहीं है।
सच कहूँ तो श्वानः की तरह
भटकना नहीं है।
सच कहूँ मुझे सूरज की तरह
जलना भी है।
सच कहूँ उसी की तरह
मुझे चमकना भी है।
सच कहूँ तो अभी
कविता लिख रही हूँ,
सच कहूँ तो अपना
भाग्य भी खुद ही लिखना है।
— सृष्टि पाण्डेय