आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सच कहूँ

                
                                                         
                            सच कहूँ तो उड़ना
                                                                 
                            
मुझे परिंदे की तरह है।
सच कहूँ तो बहना
मुझे कश्ती की तरह है।
सच कहूँ तो मुझे अपना
ठिकाना ढूँढना है।
सच कहूँ मुझे अपना
किनारा ढूँढना है।
सच कहूँ तो जुगनू की तरह
चमकना नहीं है।
सच कहूँ तो श्वानः की तरह
भटकना नहीं है।
सच कहूँ मुझे सूरज की तरह
जलना भी है।
सच कहूँ उसी की तरह
मुझे चमकना भी है।
सच कहूँ तो अभी
कविता लिख रही हूँ,
सच कहूँ तो अपना
भाग्य भी खुद ही लिखना है।
— सृष्टि पाण्डेय
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर