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परीक्षा पे चर्चा

Priyanka Vasantavada

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अपने घर की उम्मीद,
        
                                                    
                            
थे तुम पुर-उम्मीद।
परीक्षा की कसौटी पर,
कसे जाने को तत्पर।
डटकर दिया जवाब तुमने,
हर एक प्रश्न का बिना डरे।
मां सरस्वती की कृपा से,
प्रखर बुद्धि जागृत करे।

जब परिणाम आया तेरा,
तो टूटा न दिल सिर्फ तेरा।
एक ही झटके में तू गिरा,
फ़लक से किसी सहारे बिना।
मलहम क्या रहम तक,
नहीं हुई नसीब अब तक।
और हो भी कैसे जब,
भागमभाग खेल न
रहकर हो गया
जीवन का एकमात्र फ़लसफ़ा।

खा गए तेरे सुअवसर
लालच के ये दीमक।
इससे न हुआ शर्मसार,
धर्म का कोई ठेकेदार।
क्या वाग्देवी का अपमान नहीं,
शिक्षा तंत्र में धांधली?

भविष्य देश का तो है
बच्चों की शिक्षा से ही।
स्वर्णिम भूत में भारत हुआ
बौद्धिक कौशल से विश्वगुरु।
जिन पितरों के विद्वत का व्याख्यान करते,
अब तक दुनिया के पटल पे तालियां बटोरते।
क्या स्वीकार करेंगे हमारे तर्पण,
जब निस्सार किया उनका समर्पण?

यहां मरीज़ सब याददाश्त के,
लोकतंत्र का मर्म भुला बैठे।
सत्ता होती प्रजा की जहां,
सेवक होता है प्रधान!
अपने हर रुपये का हिसाब हो,
और हर ज़रूरियात मुहैया हो।
स्वतंत्र अगर है हमारा देश तो,
राजतंत्र से जवाबदेही हम मांगते।
अस्सी साल होने को है आज़ादी को,
फिर भी सवाल गुनाह क्यों?
परीक्षा पे चर्चा है,
एक पात्र अभिनय क्यों?

कब तक भटकेंगे दर बदर,
कभी गांव तो कभी शहर।
कुछ प्रदेश से प्रदेश,
तो कई और देस से परदेस।
शिक्षा और रोज़गार की
तलब में निकले घर से ये।
झोला लेकर चले बिन फकीरी,
कंधों पर लाद ज़िम्मेदारी।
होते अगर इनके पास आसार
करने अपने जीवन को साकार,
तो होते हमारे तृप्त पितर,
देखकर अपनी नस्ल बेफिक्र।
छूती फिर ये चिड़िया सुनहरी,
आसमानी मुक़ाम ऊंचाई।
3 महीने पहले
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