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जश्न ए बर्बादी

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं नाकामियों का जश्न मना रहा हूं चल कर अजनबी शहर के अजनबी रस्तों में उलझनें बढ़ा रहा हूं
        
                                                    
                            
गिला तुमसे करना भी आसान इतना नहीं बढ़ा कर मुश्किलें लौट के तेरे दर से मैं फासला बढ़ा रहा हूं
सामने तेरे जिक्र मुफलिसी का अब कर सकता नहीं कर के इंतजार तेरे वादों का मैं दूरियां बढ़ा रहा हूं
बगैर तेरे मेरी जिंदगी को हुआ क्या सोच कर कुछ देर डूब कर ख्वाबों में दिल अपना ही बहला रहा हूं
उदासियां भी कर रही इशारा मुझको हुआ क्या मैं होकर मजबूर तेरी दुनिया से फासला बढ़ा रहा हूं
2 महीने पहले
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