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किस्सा ए महरूम जिंदगी

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हुआ जब तू सामने मेरे तो बढ़ा कर दर्द ओ तमन्ना होकर मायूस जिंदगी से गम सारा हम समेटने लगे
        
                                                    
                            
मिले हो तुम आज अचानक बाद मुद्दत मुझसे करके अब जीना हराम कांटों से हीं दोस्ती हम करने लगे
भुला के वादा ए उल्फत खुश हो तुम अब शायद बहुत मिटा के अरमां मिल कर दीवारों से हम रोने लगे
हैं हम नादां कितना जो समझ ना पाए अंदाज़ आपका आजमा के बार बार घूंट जहर का हम पीने लगे
लगा कर इल्जाम मुझ पर चैन ओ सकूं तुमने छीन लिया है रोने से होगा कुछ नहीं दर्द हम समेटने लगे
3 घंटे पहले
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Sanjai kumar

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