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मन दोराहे पर....

prem kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मन दोराहे पर
        
                                                    
                            

जीवन के दोराहे पर खड़े तुम्हारे मन को देखा,
तो मन ठहर गया।
आत्ममंथन में उलझे तुम्हारे अंतर्द्वंद्व को देखा,
तो मन ठहर गया।

विचलित स्तब्ध खड़ा वह मन,
निश्चित ही असमंजस में था।
शौर्य, अहंकार, दंभ, प्रेम- मध्य,
संभवतः गहन भ्रमित था।
समझ नहीं पा रहा था वह,
अपने भीतर के अंतर्द्वंद्व को,
कदाचित भीतर ही भीतर मन
नित से संघर्षरत था।

आक्रोश, द्वेष, ग्लानि या फिर,
बैर-भाव अपनो से ,
ये तो मात्र बाह्य रूप हैं,
उपजा है जो स्वयंके अंतर्द्वंद्व से।
जब भान हुआ तुम्हारे मन की मौन पीड़ा का,
तब निशब्द मन ठहर गया।
आत्ममंथन में उलझे तुम्हारे अंतर्द्वंद्व को देखा,
तो मन ठहर गया।

सुन मन ! समय-चक्र ने समय-समय पर,
दंभ, अहंकार और मिथ्या-शौर्य के,
घोर परिणामों का जग को साक्ष्य दिया है।
कभी रामायण कभी महाभारत रच,
अवांछित मृगतृष्णाओं से जन्मे
घोर विनाश का संज्ञान दिया है।
अधर्म को साहस कह देने से वह,
धर्म नहीं बन जाता है,
अहंकार, दंभ और हठधर्मी तब,
शौर्य नहीं विनाश का आमंत्रण बन जाता है।
युगों युगों की इस सीख का तुम्हारे,
मन संग द्वंद्व देखा,तो मन ठहर गया,
आत्ममंथन में उलझे तुम्हारे अंतर्द्वंद्व को देखा,
तो मन ठहर गया।

कठिन नहीं है भेद उचित-अनुचित का,
न गूढ़ ज्ञान का विषय है।
बहुत सरल है समझना किंतु,
स्वीकारना बहुत कठिन है।
बन विवेकशील स्वयं के आचरण का,
मन जब तुम मनन करोगे,
दंभ -द्वेष, न क्रोध ईर्ष्या अपनों से,
अपितु प्रेम की अनुभूति करोगे।

कहे " प्रेम" मन!चुन राह विवेक की,
क्यों दोराहे पर चिंतित मन ठहर गया?
आत्ममंथन में उलझे तुम्हारे अंतर्द्वंद्व को देखा,
तो मन ठहर गया।
 
2 महीने पहले
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