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एक मुलाकात मिर्ज़ा ग़ालिब से।

prem kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इक मुलाक़ात मिर्ज़ा ग़ालिब से।
        
                                                    
                            

पुरानी दिल्ली की तंग बल्लीमारान की गलियों से गुज़रा तो एक शख़्स-सा कोई नज़र आया। आज भी शायद उसी अंदाज़ में, वो वहीं तो बैठा था।
काली मख़मल से बनी किश्ती-नुमा वो टोपी—हाँ, उसे कुलाह कहते हैं—सिर पर पहने हुए,
सफ़ेद-सुर्ख दाढ़ी, आँखों में वही शायराना सोच की चमक, मगर चेहरे पर भीतर की किसी गहरी उदासी की परछाईं।
शाही मगर कुछ अस्त-व्यस्त-सा लंबा चोंगा पहने कोई शख़्स वहाँ बैठा था।

जब उसके करीब से गुज़रा तो कुछ जाना-पहचाना-सा लगा।
कदम ख़ुद-ब-ख़ुद आगे निकलकर ठहर गए। मन ठिठककर वहीं रुक गया और दिल ने कहा—
“ये तो ग़ालिब साहब हैं!”

मैंने संकोच से पूछा—
“ग़ालिब साहब… आप हैं?”

दर्द और शायरी से भरी उन आँखों ने उठकर मेरी ओर देखा।
होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई और उसी शायराना अंदाज़ में बोले—
“हाँ मियाँ, हम ही असदुल्लाह ख़ाँ ग़ालिब हैं। वही ग़ालिब, जिसने ताज़िंदगी ज़माने से गिला किया, तन्हाई से दिल लगाया, और कम्बख़्त दिल्ली की गलियों को अपनी शायरी से आबाद रखा।”

मैं कुछ पल उन्हें देखता रहा, अपनी आँखों और ज़ेहन को यक़ीन दिलाता रहा।
फिर धीरे से पूछा—
“मिर्ज़ा साहब, आप अब भी यहीं बैठे हैं?”
उन्होंने मेरी ओर देखा। चेहरे पर वही हल्की मुस्कान थी। बोले—
“हम कहीं नहीं गए मियाँ... हम तो यहीं ठहरे रहे। बस वक़्त मुसाफ़िर निकला और गुज़र गया। आज भी हमारे क़दम उन्हीं पुरानी गलियों के असीर हैं, और हमारी रूह उन्हीं पुरानी तन्हाइयों की महरम।”

पूछना तो नहीं था, मगर अनायास ही एक सवाल निकल पड़ा—
“ये दर्द कहाँ से लाते हैं आप अपनी शायरी में?”
वे मुस्कुराए। अपने आरिफ़ाना और रिंदाना-मस्ती भरे अंदाज़ में हुक़्क़े का एक कश लिया और बोले—
“मियाँ! तुम भी क्या मासूम सवाल पूछते हो। यह दर्द बाज़ार में बिकने वाली कोई जिन्स नहीं, जिसे हम कहीं से मोल उठा लाएँ। यह तो वो जागीर है, जो ज़िंदगी ने हमें ख़ैरात में नहीं, बल्कि ब-तौर-ए-क़र्ज़ दी है।”
कुछ पल ठहरे, फिर बोले—
“अगर मेरा जवाब मेरे ही एक शेर में सुनना चाहो, तो सुनो—”
रौ में है रक़्श-ए-उम्र, कहाँ देखिए थमे
न हाथ बाग पर है, न पा है रिकाब में।

मैं उनकी ओर देखता रहा।
शायद उस एक शेर में उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी रख दी थी—
वक़्त भाग रहा था, उम्र गुज़र रही थी और इंसान… बस देख रहा था।

अब मुलाक़ात हो ही गई थी, तो चलते-चलते मैंने पूछा—
“मिर्ज़ा साहब, आज के दौर को देखकर क्या कहेंगे आप?”
उन्होंने कुछ पल ख़ामोशी ओढ़ी। फिर धीमे से बोले—
“दौर तो हर बार बदलता है, मियाँ…
बस आदमी वही रहता है—
कभी ख़ुद से परेशान,
कभी दुनिया से ख़फ़ा,
और कभी अपने ही दिल का तमाशबीन।”

मैं सुनता रहा।
पता ही नहीं चला कितने अरसे निकल गए। बल्लीमारान की वही गली थी, वही पुरानी हवाओं की ख़ुशबू थी, और सामने वही ग़ालिब बैठे थे।

लेकिन अगले ही पल जब नज़र उठी, वहाँ कोई नहीं था।
सिर्फ़ ख़ामोश गली थी…
और हवा में जैसे कोई शेर तैर रहा था।
मैं कुछ देर वहीं खड़ा रहा।
तब लगा—
ग़ालिब शायद कभी गए ही नहीं।
वो आज भी ज़िंदा हैं…
बस उन्हें देखने के लिए आँखें नहीं,
एक शायराना दिल चाहिए।

 
एक घंटा पहले
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