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कश्मकश में ज़िंदगी की दौड़ता गया

Praveen Rai

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कश्मकश में ज़िंदगी की दौड़ता गया
        
                                                    
                            
सब पाने की दौड़ में छोड़ता गया !!
दोस्त जो स्कूल के थे छूटते गये,
रिश्ते जो बने थे सभी टूटते गये!
दोस्त नये नये कॉलेज में मिले
फिर वक़्त बेरहम ने किए उनसे फ़ासले !!
अब आया तकनीकियों का ये नया दौर
जिससे मिले नए और पुराने कई और !!
एक मुक़ाम सब पुराने भी मिल गए
पुरानी क़मीज़ के फिर बटन है सिल गए !
माना अठखेलियां अब सब उदास थी,
दोस्त मिले सब सहेलियां उदास थीं !
कोई बनी मां तो कोई सास बन गयी,
कोई हुई मोटी तो कोई जवां सही !
ज़िम्मेदारियों का बोझ यूं झलक रहा,
दीखे है आसां न किसी का फलक रहा !
लिब्दो और मुरचन का ज़माना वो और था ,
एक रुपये की ढेर टॉफ़ियों का दौर था ,
भाव पूछने में कई बेर खा गये,
एक ने लिए और सब निकल गये !
माना वो दौर अब ना आएगा कभी
भले मिल गए बिछड़े यार फिर सभी !
यारों वही यादों का पिटारा सा खोल दो
मिलो किसी ऐप पर तो सबको फिर तौल दो!
कश्मकश में ज़िंदगी की दौड़ता गया
सब पाने की दौड़ में छोड़ता गया !!

-- Praveen Rai
Chicago, USA


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