विज्ञापन

ख़ूबसूरत नज़्म है नाकामियों की

Praveen Mahant

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            क्या सम्प्त है आखिर कहानियों की,
        
                                                    
                            
मंज़िल नहीं है कोई बेताबियों की,

मुसाफ़िर मरकर भी ज़िंदा ही है..
क्या दवा है आखिर इन बीमारियों की,

तुम्हारे कदमों को क्यों सुकून मिलेगा..
यहाँ कोई मस्जिद नहीं है काफ़िरों की,

अपाहिज को ये जानकर तसल्ली हुई..
यहाँ बाज़ार भी है बैसाखियों की,

चलना चाहते हो मगर हमसफ़री में..
बहुत लंबी कतार है इंतज़ारियों की,

सिर्फ़ तुम्हें नहीं है चाह रास्ते की..
रास्ते को भी ज़रूरत है बैरागियों की,

उम्मीद हार चोट दर्द बेबसी उम्मीद..
क्या ख़ूबसूरत नज़्म है नाकामियों की।
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all