गिनूँ नज़दीकियाँ या दूरियों को नापूँ,
जाने किसकी तरफ झुका हुआ है तराज़ू।
कल से अनजान मैं और आज से बेख़बर,
दोनों पकड़ने पर दुखते हैं बाज़ू।
इस बेहोशी का कौन है ज़रिया,
लम्हों का मेला या महकशी का जादू।
ख़ुशी इस हद तक मुख़्तसर कि जैसे,
ग़म के समंदर में मुस्कान का टापू।
शाख़ निकल आते हैं उन दरख़्तों से,
जहाँ जहाँ मैं बीते कल को पाटूँ।
गुनहगार पे मुक़दमे चले हैं लेकिन,
मैं ही मिलूँ जब जब गहराई में झाँकूँ।
पर किस गुनहगार को मिले सज़ा बेज़ारी की,
दिल, दिमाग़, अहम्, किस किस को छाँटूँ।
दिल से आँख का रास्ता तय न कर सके,
ज़ेहन के मुसाफ़िर बने हुए हैं आँसू।