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पिता: एक अनकहा साया

praveen bhardwaj

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                            उंगलियाँ थामकर जिसने चलना सिखाया,
        
                                                    
                            
खुद धूप में जलकर जिसने हमें साया दिलाया।
वो कभी रोकर अपने दुःख नहीं दिखाता,
वो पिता है, जो खामोशी से हर फ़र्ज़ निभाता।

माथे की लकीरें उसकी संघर्ष की कहानी हैं,
हाथों की दरारें जैसे त्याग की निशानी हैं।
हमारी हर छोटी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए,
उसने अपनी हर बड़ी जरूरत हँसकर भुलानी है।

घर की वो मज़बूत छत है वो, जो हर तूफ़ान सहती है,
जिसकी आँखों में बच्चों की तरक्की की चाह बहती है।
माँ अगर ममता का समंदर है इस जहाँ में,
तो पिता वो चट्टान है, जिस पर पूरी गृहस्थी टिकी रहती है।

कभी डांट में उसकी छिपा एक गहरा प्यार होता है,
उसका अनुसाशन ही जीवन का असली आधार होता है।
दुनिया की भीड़ में जब भी कदम डगमगाते हैं,
पिता का कंधा ही सबसे सुरक्षित सहारा होता है।
एक पिता ही तो हर जगह अनकहा साया होता है।
3 महीने पहले
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