जिंदगी-ओ-जिंदादिली, मुंतशिर कर बैठे हम कब की,
एक दीदार-ए-खुमार में, सुबह से शाम कर बैठे हम कब की।
उसकी नूरी-झलक के लिए तरसता है क़ल्ब मेरा आज भी,
उस दिन न जाने क्यों न आया महबूब मेरा, सोचता है मन आज भी।
इंतज़ार करता रहा उल्फ़त-ए-फ़ुआद में पड़े-पड़े आज भी,
घड़ी-दर-घड़ी गिनता रहा, थका न जिगर आज भी।
ज़हन के रास्ते में मेरे, वो नज़र आई आज भी,
नक़्श-ओ-नज़ारा उसका, दिल में कौंध गया आज भी।
एतबार-ए-मुलाक़ात है कि मिलेगा वो हमें कभी न कभी,
मुश्ताक़-ए-ख़याल पाले बैठा है यह जान आज भी।
यूं तो मुंतशिर मेरा हृदय पड़ा है आज भी,
पर मर्कज़-ए-अहसास ने बांधे रखा मेरी जिंदादिली को आज भी,
वह न आएगा—ख़यालात-ए-रूह में आना नामुमकिन है आज भी।
करेगा 'फ़र्जहिंद' ता-उम्र आस उसकी...
तबतलक दीदार-ए-यार में बसर करेगा,
जब तक जान में जान है मेरी!