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आज ऑफिस में काम ज़्यादा

Prateet Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज ऑफिस में काम ज़्यादा
        
                                                    
                            
ज़्यादा हो गया समय,
समय पर न निकल पाने से
से मन घबराहट है भरी।
भरी सड़क सुनसान नज़र आती,
आती ना कोई जान पहचान कहीं।
कहीं कोई अनहोनी ना खड़ी हो,
हो उमड़ पड़ी ये दुविधा।
दुविधा शांत कर चली,
चली एक जान अकेली।
अकेली थी वह सुनसान सड़क पर,
पर रही संसाधन विहीन खड़ी।
खड़ी-खड़ी सोच वह,
वह पहुँचे कैसे घर।
घर ना था दूर इतना,
इतना जितना सौ-दो सौ कदम।
कदम-कदम आगे चल बढ़ी।
बढ़ी चली बीस-तीस ही कदम आगे,
आगे मिल गए कई शिकारी।
शिकारी जो थे ताक लगाए बैठे अंधेरे में कहीं।
कहीं मिल जाए उन्हें आज अबला नारी यही,
यही अनहोनी जो ना होनी थी,
थी हो गई शिकार वह भी।
भी उसकी पुकार सन्नाटे जा मिली,
मिली अगले दिन है।
है वस्त्रविहीन वह,
वह लोथ पड़ी।
पड़ी वह नहीं पड़ा है देश,
देश जिसमें चला राजनीति खेल।
खेल जिसमें शामिल हो गया,
गया न्यायालय का भी न्याय।
न्याय व्यवस्था क्या करें,
करें न समाज कोई उपाय?
 
2 महीने पहले
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