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आचरण में विनम्र सदाचार हो

PRANJAL

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक छत ऐसी भी हो,
        
                                                    
                            
जहाँ खुदा और भगवान भी हों,
हर जुबां पर
गीता और कुरान भी हो।

एक छत ऐसी भी हो,
जहाँ इंसान सिर्फ इंसान हो,
हर एक का सम्मान हो।

वहाँ हर किसी की पहचान हो—
न कर्म से, न धर्म से,
न वर्ग से, न गर्भ से,
न धन से, न तन से,
न रूप से, न स्वरूप से,
न रंग से, न अंग से।

एक छत ऐसी भी हो,
जहाँ न कोई जात-पात की दीवार हो,
औरतों को जकड़ती न कोई
अदृश्य जंजीर हो,
लकीर का फकीर
किसी की न तक़दीर हो।

एक छत ऐसी भी हो,
जहाँ भाषा विवाद का नहीं,
संवाद का विषय हो।

विचार सामंतवाद का नहीं,
तर्कवाद का हो।

जहाँ सवालों से डर न लगे,
और जवाबों पर पहरा न हो।

एक छत ऐसी भी हो,
जहाँ बुद्ध के विचार हों,
आचरण में विनम्र सदाचार हो,
और मानवता की पुकार हो।

एक छत ऐसी भी हो!
एक छत ऐसी भी हो!

"पर कब तक सिर्फ पन्नों और ख़्वाबों में ही यह जहान रहेगा?
अगर आज हम न जागे, तो इंसान सिर्फ किताबों में इंसान रहेगा!"
- प्रांजल मौर्य 'प्रखर'
2 सप्ताह पहले
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