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मुहब्बत का अहसास

Pramod Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी बहुत तू मुझे मेरे पास लगती है
        
                                                    
                            
कभी लगता है तू मुझ ही सी उदास लगती है।
मैं लगता है तू किसी और की अमानत है
कभी मुझे मेरी मुहब्बत का अहसास लगती है।।

अपने दिल पे मैंने तेरा इख्तियार समझा है
तभी तो तेरे गुस्से को भी मैंने प्यार समझा है।
तेरी अदाओं को अपनी तहरीर पे यूं उतारा है
मैंने तुझे अपना ही कोई अशरार समझा है।।

तू खफा रह मगर इतना तो बता दे मुझको
तेरी मुझसे खफा रहने की वजह क्या है।
मुझे अहसास तो करा दे मेरी गुस्ताखी का
तू मुझे ये तो बता दे कि मेरा गुनाह क्या है।।

मेरे हालातों ने मेरी तस्वीर बिगाड़ रक्खी है
अगर तूने इसे संवारा तो संवर जाऊंगा मैं।
मुझे पहले भी बहुत सताया है इस मुहब्बत ने
अगर फिर से सताया तो मर ही जाऊंगा मैं।।

दिल्लगी दिल्लगी में दिल ही निकल गया हाथ से
मगर तुझको है क्या मतलब मेरी किसी बात से।
कितना बेकरार रहता हूं मैं मेरे हर दिन से पूछ
कितना बेचैन रहता हूं ये पूछ मेरी हर रात से।।

तू बदलेगी या नहीं मगर मुझको बहुत बदलना है
तेरे साथ साथ ना सही मगर तेरे रास्तों पे चलना है।
ये छोड़ता हूं मैं फैसला अपनी बेवफ़ा तकदीर पे
तेरी मुहब्बत में मचलना है या तेरे ग़म में जलना है।।
 
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करे
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